दुष्कर्म अपराध ही होता है, गलती नहीं
संदर्भ का बहुत महत्व होता है। हम जो कहते हैं और हमारा जो आशय होता है वह बहुत
कुछ इस बात पर निर्भर होता है कि कब, कहां और कैसे हमने इसे कहा है। हालांकि
कभी-कभार ऐसी भी स्थिति होती है कि कही गई बात अपने आप में इतनी स्पष्ट होती है कि
उसे समझने के लिए संदर्भ की जरूरत नहीं होती। जैसे शक्ति मिल दुष्कर्म मामले में मुलायम सिंह यादव का बयान। यहां यह साफ कहना होगा कि
दुष्कर्म अपराध ही होता है, कोई 'गलतीÓ नहीं और उसकी सजा मिलनी ही चाहिए।
हालांकि मैं और कई अन्य नारीवादी दुष्कर्म मामले में मौत की सजा के खिलाफ हैं। हम दोषियों को दंडित करने के विरोधी नहीं है बल्कि राज्य द्वारा गलत तरीके से जान लेने का अधिकार लेे लेने के खिलाफ हैं। दुनियाभर के आंकड़े बताते हैं कि मौत की सजा पाने वालों में गरीब और अल्पसंख्यक तबकों के लोगों का अनुपात ज्यादा है। दिल्ली और शक्ति मिल दुष्कर्म घटनाओं के बाद मीडिया ने लगातार दुष्कर्मियों की गरीब व वंचित पृष्ठभूमि पर फोकस किया। इससे चाहे-अनचाहे यह संदेश गया कि निम्न तबके के पुरुष ही ऐसे अपराध करते हैं।
हाल में मुलायम और अबु आजमी के बयानों की वाम व दक्षिणपंथी हर विचारधारा के लोगों ने आलोचना की। इसके पहले भी ऐसे बयान आए हैं। आसाराम बापू ने कहा था कि पीडि़ता ने दुष्कर्मी को भाई कहा होता तो घटना नहीं होती। खाप पंचायत के जितेंदर छत्तर ने कहा था कि चाऊमिन खाने से हार्मोन का असंतुलन होता है, जिसके कारण ऐसी घटनाएं होती हैं। छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ननकीराम ने कहा था कि वजह ग्रहों की स्थिति है। इन बयानों को महिलाओं के कपड़ों पर मर्यादा बांधने, उन्हें सेलफोन न देने या उन्हें घर में नजरबंद रखने जैसे आह्वानों के साथ रखकर देखा जा सकता है।
इससे भी खतरनाक तो प्रगतिशील होने के नाम पर दी जा रहीं दलीलें हैं। हाल ही में एक ख्यात लेखिका ने तरुण तेजपाल के मामले में पीडि़ता की गवाही पर ही सवाल उठा दिए। एक अन्य मामले में बैलेंस्ड स्टोरी के नाम पर न सिर्फ पीडि़ता की पहचान को खतरे में डाल दिया गया बल्कि उसकी गवाही पर सफलतापूर्वक प्रश्न चिह्न लगा दिया गया। गौरतलब है कि ये दोनों लेख सीसीटीवी फुटेज पर आधारित हैं, जो अदालत के निर्देशों के अनुसार इन तक नहीं पहुंचने चाहिए थे। नेटवर्क ऑफ वुमन इन इंडिया ने प्रेस काउंसिल और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया में शिकायत की कि यह पत्रकारिता के नैतिक मानदंडों के खिलाफ है और यह मामले को प्रभावित करने का सोचा-समझा प्रयास हो सकता है।
इस तरह नारीवादियों के सामने चुनौती सिर्फ नेताओं के बेतुके बयानों का विरोध करने की नहीं है। कई लोग जोर देकर कहेंगे कि कमजोर वर्ग की पृष्ठभूमि वाले अपराधी सजा पाने के हकदार हैं। लेकिन कठिन पर उतना ही महत्वपूर्ण है तरुण तेजपालों के विशेषाधिकारों का बचाव करने वाली आवाजों का विरोध। ऐसा इसलिए कि मुलायम जैसे बयान और तेजपाल के मामले में पीडि़ता को दोषी ठहराने के प्रयास उसी संदर्भ के दो पहलू हैं कि यदि महिला पर हमला हुआ है तो उसी ने ऐसा कुछ किया होगा।
लेखिका टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में असिस्टेंट प्रोफसर हैं।
Source : http://www.bhaskar.com/article/ABH-shilpa-phadke-column-mulayam-singh-yadavs-statement-4582603-NOR.html
हालांकि मैं और कई अन्य नारीवादी दुष्कर्म मामले में मौत की सजा के खिलाफ हैं। हम दोषियों को दंडित करने के विरोधी नहीं है बल्कि राज्य द्वारा गलत तरीके से जान लेने का अधिकार लेे लेने के खिलाफ हैं। दुनियाभर के आंकड़े बताते हैं कि मौत की सजा पाने वालों में गरीब और अल्पसंख्यक तबकों के लोगों का अनुपात ज्यादा है। दिल्ली और शक्ति मिल दुष्कर्म घटनाओं के बाद मीडिया ने लगातार दुष्कर्मियों की गरीब व वंचित पृष्ठभूमि पर फोकस किया। इससे चाहे-अनचाहे यह संदेश गया कि निम्न तबके के पुरुष ही ऐसे अपराध करते हैं।
हाल में मुलायम और अबु आजमी के बयानों की वाम व दक्षिणपंथी हर विचारधारा के लोगों ने आलोचना की। इसके पहले भी ऐसे बयान आए हैं। आसाराम बापू ने कहा था कि पीडि़ता ने दुष्कर्मी को भाई कहा होता तो घटना नहीं होती। खाप पंचायत के जितेंदर छत्तर ने कहा था कि चाऊमिन खाने से हार्मोन का असंतुलन होता है, जिसके कारण ऐसी घटनाएं होती हैं। छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ननकीराम ने कहा था कि वजह ग्रहों की स्थिति है। इन बयानों को महिलाओं के कपड़ों पर मर्यादा बांधने, उन्हें सेलफोन न देने या उन्हें घर में नजरबंद रखने जैसे आह्वानों के साथ रखकर देखा जा सकता है।
इससे भी खतरनाक तो प्रगतिशील होने के नाम पर दी जा रहीं दलीलें हैं। हाल ही में एक ख्यात लेखिका ने तरुण तेजपाल के मामले में पीडि़ता की गवाही पर ही सवाल उठा दिए। एक अन्य मामले में बैलेंस्ड स्टोरी के नाम पर न सिर्फ पीडि़ता की पहचान को खतरे में डाल दिया गया बल्कि उसकी गवाही पर सफलतापूर्वक प्रश्न चिह्न लगा दिया गया। गौरतलब है कि ये दोनों लेख सीसीटीवी फुटेज पर आधारित हैं, जो अदालत के निर्देशों के अनुसार इन तक नहीं पहुंचने चाहिए थे। नेटवर्क ऑफ वुमन इन इंडिया ने प्रेस काउंसिल और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया में शिकायत की कि यह पत्रकारिता के नैतिक मानदंडों के खिलाफ है और यह मामले को प्रभावित करने का सोचा-समझा प्रयास हो सकता है।
इस तरह नारीवादियों के सामने चुनौती सिर्फ नेताओं के बेतुके बयानों का विरोध करने की नहीं है। कई लोग जोर देकर कहेंगे कि कमजोर वर्ग की पृष्ठभूमि वाले अपराधी सजा पाने के हकदार हैं। लेकिन कठिन पर उतना ही महत्वपूर्ण है तरुण तेजपालों के विशेषाधिकारों का बचाव करने वाली आवाजों का विरोध। ऐसा इसलिए कि मुलायम जैसे बयान और तेजपाल के मामले में पीडि़ता को दोषी ठहराने के प्रयास उसी संदर्भ के दो पहलू हैं कि यदि महिला पर हमला हुआ है तो उसी ने ऐसा कुछ किया होगा।
लेखिका टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में असिस्टेंट प्रोफसर हैं।
Source : http://www.bhaskar.com/article/ABH-shilpa-phadke-column-mulayam-singh-yadavs-statement-4582603-NOR.html
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